श्रीमद्भगवद् गीता: अध्याय १, अर्जुन विषाद योग
।। मूल संस्कृत श्लोक।।धृतराष्ट्र उवाच:धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥ १॥-:: श्लोक का स्पष्ट अर्थ ::-धृतराष्ट्र ने कहा"हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?"यह श्लोक श्रीमद्भगवद् गीता का प्रवेश द्वार है, जो हमें सीधे उस मानसिक और भौतिक युद्धभूमि में ले जाता है जहाँ धर्म और अधर्म का संघर्ष चरम पर है। श्लोक के प्रत्येक पद का गहन अर्थ समझना आवश्यक है: इसका प्रथम वाक्य, धृतराष्ट्र उवाच यानि धृतराष्ट्र बोले हमें अज्ञान और मोह का प्रतीक दर्शाता हे. यह महत्त्वपूर्ण है कि गीता का आरंभ भगवान श्रीकृष्ण के बजाय एक अंधे राजा यानि की धृतराष्ट्र के कथन से होता है। धृतराष्ट्र केवल शारीरिक रूप से अंधे नहीं थे, बल्कि वे पुत्र-मोह के कारण भी अंधे थे। यह मोह रूपी अंधापन उन्हें धर्म और न्याय के बीच का अंतर नहीं देखने देता। धृतराष्ट्र का चरित्र हमारे मन में बैठे उस अज्ञान का प्रतीक है जो अपनी अयोग्य इच्छाओं यानि अधर्म को धर्म की कसौटी पर परखने से डरता है। उनका यह प्रश्न "क्या हुआ?" उनकी गहरी असुरक्षा और संदेह को दर्शाता है। वे जानते हैं कि वे अधर्म के पक्ष में हैं, इसलिए वे चिंतित हैं कि कहीं धर्मक्षेत्र के प्रभाव से उनके पुत्रों का मन युद्ध से विचलित न हो जाए।
इस श्लोक का द्वितीय वाक्य हे धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे इसका अर्थ ये होता हे की धर्म की भूमि और कर्म की भूमि ये दोनों पद श्लोक की सबसे गहरी दार्शनिक नींव रखते हैं। कुरुक्षेत्र यानि कर्मभूमि: 'कुरु' का अर्थ है कर्म। कुरुक्षेत्र वह स्थान है जहाँ कर्म किया जाता है। यह वह भूमि है जहाँ कौरव और पांडव अपने पिछले कर्मों के फलों को भोगने के लिए एकत्रित हुए हैं। यह हमारे भौतिक जीवन यानि Material World और कार्यक्षेत्र यानि Workplace का प्रतिनिधित्व करता है। धर्मक्षेत्र यानि नैतिक भूमि: यह वह पवित्र स्थान है जहाँ धार्मिक निर्णय लिए जाते हैं। महाभारत का युद्ध यद्यपि सत्ता के लिए लड़ा गया, पर इसका मूल आधार धर्म और न्याय की स्थापना था। गूढ़ अर्थ: इन दो शब्दों का संयोग बताता है कि मानव जीवन की प्रत्येक परिस्थिति और प्रत्येक कर्मक्षेत्र यानि कुरुक्षेत्र वास्तव में धर्म की कसौटी यानि धर्मक्षेत्र है। जो हमारे जीवन के हर मोड़ पर धर्म और कर्तव्य की परीक्षा होती है। यह संघर्ष केवल दो सेनाओं के बीच नहीं, बल्कि हमारे भीतर के धर्म और अधर्म के बीच है।
इस श्लोक का तृतीय वाक्य हे मामकाः पाण्डवाश्चैव यानि मेरे और पांडु के पुत्र: इसका अर्थ भेद और आसक्ति दर्शाता हे. धृतराष्ट्र के इस वाक्य में उनकी आसक्ति और पक्षपात स्पष्ट रूप से झलकते हैं। जिसमे भेदभाव सबसे पहेले दीखता हे, पांडव भी धृतराष्ट्र के भतीजे थे, और वे उनके संरक्षण में रहे थे, फिर भी धृतराष्ट्र अपने पुत्रों के लिए 'मामकाः' यानि मेरे वाले और पांडवों के लिए पाण्डवा यानि पांडु के पुत्र शब्द का प्रयोग करते हैं। यह मैं और मेरा तथा तुम और तुम्हारा का द्वैत भाव है। यही द्वैत भाव सभी मानसिक और सामाजिक संघर्षों का मूल कारण है। यह दर्शाता है कि जब मन मोहग्रस्त होता है, तो वह अपने और पराये में भेद करने लगता है, फिर भले ही परिस्थिति धार्मिक ही क्यों न हो।
श्लोक का अगला शब्द हे किमकुर्वत सञ्जय यानि क्या किया संजय ? : इसमें परिणाम की चिंता स्पस्ट दिखती हे. अंधे धृतराष्ट्र, वेदव्यास से प्राप्त दिव्य दृष्टि वाले संजय से पूछते हैं कि वहाँ क्या हो रहा है। उनका प्रश्न कार्य की प्रकृति यानि युद्ध के बारे में नहीं, बल्कि परिणाम के बारे में है। वे जानना चाहते हैं कि धर्मक्षेत्र के प्रभाव से वहाँ कुछ विपरीत यानि अनपेक्षित तो नहीं हो गया? यह प्रश्न मनुष्य की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है जब वह सही काम करने के बजाय, अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए किए गए कर्मों के परिणाम को लेकर चिंतित होता है। अंधे धृतराष्ट्र, वेदव्यास से प्राप्त दिव्य दृष्टि वाले संजय से पूछते हैं कि वहाँ क्या हो रहा है। उनका प्रश्न कार्य की प्रकृति यानि युद्ध के बारे में नहीं, बल्कि परिणाम के बारे में है। वे जानना चाहते हैं कि धर्मक्षेत्र के प्रभाव से वहाँ कुछ विपरीत यानि अनपेक्षित तो नहीं हो गया? यह प्रश्न मनुष्य की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है जब वह सही काम करने के बजाय, अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए किए गए कर्मों के परिणाम को लेकर चिंतित होता है।
तो चलिए अब इस श्लोक का आधुनिक जीवन में अर्थघटन और प्रासंगिकता को जानने का प्रयत्न करते हे. गीता का पहला श्लोक आज के जटिल और प्रतिस्पर्धी युग के लिए एक गहन प्रबंधन दर्शन यानि Management Philosophy और आत्म-विकास Self-Development का संदेश देता है। श्लोक का यह वाक्य धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे': कॉर्पोरेट युद्ध और नैतिक जिम्मेदारी को दर्शाता हे. आज के आधुनिक जीवन में, हर व्यक्ति अपनी तरह का एक योद्धा है जो एक कुरुक्षेत्र में लड़ रहा है, आपका कार्यालय यानि Office ही कुरुक्षेत्र है, हमारा कार्यस्थल, करियर, या बिज़नेस का मैदान हमारा 'कुरुक्षेत्र' है, जहाँ प्रतिस्पर्धा और लक्ष्य प्राप्ति के लिए निरंतर कर्म होते हैं। यहाँ, हर दिन हमें नैतिक दुविधाओं का सामना करना पड़ता है क्या मैं डेटा में हेराफेरी करूँ जो अधर्म हे, या सत्यनिष्ठा बनाए रखूँ जो धर्म हे. क्या मैं अपने सहकर्मी को नीचा दिखाऊँ जो अधर्म, या सहयोग करूँ जो धर्म हे.यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि "आपका कार्यक्षेत्र एक नैतिक क्षेत्र भी है। " सफलता प्राप्त करने के लिए अपनाई गई पद्धति धर्मसम्मत होनी चाहिए। केवल परिणाम ही नहीं, बल्कि कर्म की पवित्रता भी मायने रखती है।
हमारा मन ही धर्मक्षेत्र है, सबसे बड़ा युद्ध बाहर नहीं, बल्कि हमारे मन के भीतर चलता है। हमारे सद्विचार (पांडव) और दुर्विचार (कौरव) निरंतर लड़ते रहते हैं। जब मन किसी निर्णय की दहलीज पर होता है (जैसे धृतराष्ट्र), तो उसे अपने विवेक यानि धर्म के प्रकाश में निर्णय लेना चाहिए। अपनी आंतरिक धर्मभूमि पर हमेशा सत्य, संयम और न्याय को विजयी बनाना चाहिए। परिणाम की आसक्ति और तनाव यह दर्शाता हे की आधुनिक जीवन में तनाव और चिंता का सबसे बड़ा कारण परिणाम का मोह है, जो धृतराष्ट्र के मोह जैसा ही है। धृतराष्ट्र का मोह पुत्रों पर था, आधुनिक युवा का मोह धन, पद, प्रसिद्धि और सोशल मीडिया लाइक्स पर है। हम कर्म की बजाय कर्मफल पर आसक्त हो जाते हैं। जब हम कर्म करते हुए भी बार-बार सोचते हैं कि "क्या मुझे सफलता मिलेगी?", "क्या लोग मेरे काम को सराहेंगे?" (किमकुर्वत सञ्जय), तो यह मोह हमारी कार्यक्षमता को नष्ट कर देता है और तनाव पैदा करता है। एक अंधा लीडर यानि धृतराष्ट्र हमेशा पक्षपाती होता है, और अपनी टीम के योग्य सदस्यों यानि पांडव को अनदेखा करके केवल अपने हित साधने वाले सदस्यों यानि कौरवों को बढ़ावा देता है।
प्रभावी लीडरशिप के लिए मोह से मुक्त विवेक आवश्यक है। एक सच्चा लीडर सभी कर्मचारियों को समान मानता है और उन्हें 'मामकाः' या 'पाण्डवाः' में विभाजित नहीं करता। यह पद आधुनिक सामाजिक, राजनीतिक और पारिवारिक संघर्षों की जड़ है। समाज में, राजनीति में या यहाँ तक कि ऑनलाइन मंचों पर भी, लोग अपने समूह के लिए 'मामकाः' और विरोधी समूह के लिए 'पाण्डवाः' की भावना रखते हैं।
यह 'मेरा पक्ष सही, तुम्हारा पक्ष गलत' की सोच ही आज के समय में नफरत और संघर्ष को बढ़ाती है। जब हम अपनी गलतियों (कौरवों) को 'मेरा' मानकर उनका बचाव करते हैं, और अपने अंदर के सद्गुणों (पांडवों) को विकसित करने पर ध्यान नहीं देते, तो आंतरिक पतन शुरू हो जाता है। अतः, श्रीमद्भगवद् गीता का प्रथम श्लोक हमें यह आत्म-चिंतन करने के लिए प्रेरित करता है कि: क्या मैं भी धृतराष्ट्र की तरह, अपने मोह के कारण, धर्म और कर्तव्य से आँखें मूँद रहा हूँ? यह श्लोक एक चेतावनी के रूप में कार्य करता है कि यदि हम अपनी आंतरिक और बाहरी कर्मभूमि पर विवेक और न्याय यानि धर्म को प्राथमिकता नहीं देंगे, तो विनाश यानि युद्ध निश्चित है। इसी विनाश से बचने का मार्ग भगवान श्रीकृष्ण गीता के आगामी 699 श्लोकों में बताते हैं। अस्तु
।। जय श्री राम ।।।। जयतु सनातन धर्म ।।
